रामायण का एक प्रसंग ऐसा है, जो आज भी पढ़ने या सुनने मात्र से रोंगटे खड़े कर देता है। यह वही दृश्य है, जब बालीपुत्र अंगद लंका के राजदरबार में रावण के सामने खड़े होकर अपना पैर भूमि पर जमा देते हैं। यह केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि धर्म और सत्य के आत्मविश्वास की उद्घोषणा थी।
रावण के दरबार में उस समय लंका के सबसे शक्तिशाली योद्धा मौजूद थे। एक के बाद एक वीरों ने अंगद के पैर को हिलाने का प्रयास किया, लेकिन कोई भी सफल नहीं हो सका। यहां तक कि इंद्रजीत और कुंभकर्ण जैसे अपराजेय माने जाने वाले योद्धा भी अंगद के पैर को टस से मस नहीं कर पाए।
इस अडिगता के पीछे अंगद की शारीरिक शक्ति से कहीं अधिक उनका आत्मबल और प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट विश्वास था। अंगद स्वयं को केवल दूत नहीं, बल्कि धर्म और सत्य के प्रतिनिधि के रूप में वहां उपस्थित मानते थे। उन्हें विश्वास था कि वे जिस मार्ग पर खड़े हैं, वह न्याय और धर्म का मार्ग है।
रामायण का यह प्रसंग यह संदेश देता है कि जब कोई व्यक्ति सत्य, धर्म और आस्था के साथ खड़ा होता है, तो संसार की कोई भी आसुरी शक्ति उसे विचलित नहीं कर सकती। अंगद का स्थिर पैर उनके अडिग संकल्प, आत्मविश्वास और प्रभु भक्ति की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति था, जिसने रावण के अहंकार को भी चुनौती दे दी।
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