पूर्व माओवादी अब राजनीति में, तेलंगाना में बढ़ी हलचल

बस्तर और दंडकारण्य जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में कभी भय और हिंसा का प्रतीक रहे आत्मसमर्पित माओवादी अब लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाते नजर आ रहे हैं। यह बदलाव न केवल सामाजिक बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

हाल ही में थिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी समेत छह पूर्व माओवादियों ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी से औपचारिक मुलाकात की। इस मुलाकात के बाद राज्य की राजनीति में उनके संभावित चुनावी प्रवेश को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

जानकारी के अनुसार, माओवादी संगठन के केंद्रीय हिंसक ढांचे में प्रमुख भूमिका निभा चुके थिप्परी तिरुपति (देवजी) के साथ ओडिशा और दंडकारण्य क्षेत्र के प्रभारी संग्राम, सुजाता, चंद्रन्ना, दामोदर और गगन्ना भी इस बैठक में शामिल रहे। इनमें से कम से कम चार पूर्व माओवादी आगामी तेलंगाना विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने की तैयारी कर रहे हैं।

तेलंगाना की राजनीति में आत्मसमर्पित माओवादियों की भागीदारी कोई नई बात नहीं है। इसका सबसे प्रमुख उदाहरण सीतक्का (दानसरी अनसूया) हैं, जो 1990 के दशक में पीपुल्स वार ग्रुप से जुड़ी रही थीं और वर्तमान में राज्य सरकार में मंत्री के रूप में कार्यरत हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि माओवादी आंदोलन की जड़ें तेलंगाना के वारंगल क्षेत्र से गहराई से जुड़ी रही हैं। चार दशक लंबे इस उग्र आंदोलन के दौरान गणपति, बसव राजू, भूपति, देवजी, सुजाता, दामोदर और संग्राम जैसे कई प्रमुख चेहरे इसी क्षेत्र से उभरे।

इस बीच, छत्तीसगढ़ में आत्मसमर्पण कर चुके माओवादी रूपेश, जो मूल रूप से तेलंगाना के निवासी हैं, ने भी बस्तर क्षेत्र में लोकतांत्रिक तरीके से अपनी लड़ाई जारी रखने की बात कही है। यह संकेत देता है कि अब हिंसा की राह छोड़कर राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे बढ़ रही है।

विश्लेषकों के अनुसार, यदि यह रुझान मजबूत होता है तो यह नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में स्थिरता और विकास के नए रास्ते खोल सकता है।#Maoists #TelanganaPolitics #Bastar #Dandakaranya #Election2026 #IndiaNews

Khushi Kumari
Author: Khushi Kumari

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