सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे हो जाएं और राजस्व विभाग को पता न चले, यह बात समझ में आती हैं। यहां तो वन भूमि ही दूसरों के नाम पर दर्ज हो रही है। यमुनापार के कोरांव तहसील में ही इसके कई मामले सामने आ चुके हैं। इससे राजस्व विभाग की कार्यशैली को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। सवाल यह उठता है कि क्या भूमि नामांंतरण के पहले पुराने दस्तावेज भी नहीं देखे जाते।
कोरांव के बेदीपट्टी में महिला काबिज थी
कोरांव तहसील के बेदीपट्टी में वन विभाग की करीब 64 बीघा वन भूमि राजस्व विभाग के दस्तावेजों में एक महिला पानकली के दर्ज हो गई थी। कई साल तक यही महिला इस वन भूमि की मालिक बनी रही। वर्ष 2024 में वन विभाग ने अपनी जमीनों के पुराने दस्तावेज निकलवाने शुरू किए। बेदीपट्टी की वन भूमि के दस्तावेज भी निकलवाए गए, जिसके बाद महकमे को इसकी जानकारी हुई। मामला प्रशासन तक पहुंचा, जिसके बाद बीते दिसंबर में भूमि फिर वन विभाग के नाम चढ़ी।कोरांव के बेलहट में कई काश्तकार कर रहे दावेदारी
इसी तहसील के बेलहट में 2044 बीघा वन भूमि है। इसमें से 472 बीघा भूमि विभाग के दस्तावेजों से गायब है। वहीं लगभग 400 बीघे वन भूमि पर कई काश्तकार दावेदारी कर रहे हैं। इस मामले का पटाक्षेप अभी तक नहीं हुआ है।मेजा तहसील में भी गड़बड़ी की आशंका
इसके अलावा मेजा तहसील क्षेत्र के चकडीहा में भी सैकड़ों बीघे वन भूमि है। बेलहट और बेदीपट्टी के बाद अब चकडीहा में भी इसी तरह की गड़बड़ी की आशंका जताई जा रही है। वन भूमि के इस तरह से विवादों में पड़ने से एक बात तो साफ है कि वन विभाग अपनी संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं है। इसी के साथ राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली भी संदेह के घेरे में है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि विभागीय कर्मचारियों की मिलीभगत से सरकारी जमीनों का नामांतरण हो रहा है।