भारत के राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस में झांकियों का विशेष महत्व है। यह परेड हर भारतीय के बचपन की यादों को संजोए हुए एक बदलती हुई कहानी प्रस्तुत करती है। 1952 में पहली बार सांस्कृतिक झांकियों की शुरुआत हुई थी, जिसने परेड में गर्व और “विविधता में एकता” की भावना को और गहरा किया।
शुरुआती दौर में झांकियां बेहद साधारण थीं—फ्लैटबेड ट्रकों पर क्षेत्रीय हस्तशिल्प और लोक कलाकारों की प्रस्तुति होती थी। समय के साथ इन झांकियों का स्वरूप बदलता गया और आज यह आधुनिक तकनीक, रचनात्मकता और सामाजिक संदेशों से भरपूर दिखाई देती हैं।
पिछले 16 वर्षों की विजेता झांकियां भारत की सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक बदलावों का प्रतीक रही हैं। इन झांकियों ने न केवल राज्यों की परंपराओं और धरोहरों को प्रदर्शित किया, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण और डिजिटल इंडिया जैसे विषयों को भी प्रमुखता से सामने रखा।
📌 झांकियों की बदलती पहचान
- 1952: साधारण ट्रकों पर हस्तशिल्प और लोक कलाकार।
- आज: एलईडी स्क्रीन, ऑडियो-विजुअल इफेक्ट्स और डिजिटल तकनीक से सजी झांकियां।
- थीम आधारित प्रस्तुति: पर्यावरण, आत्मनिर्भर भारत, महिला सशक्तिकरण और सांस्कृतिक विविधता।
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