केंद्र सरकार द्वारा घोषित पद्म पुरस्कारों की ‘अनाम नायकों’ की श्रेणी में महाराष्ट्र के पालघर जिले के 90 वर्षीय आदिवासी कलाकार भिक्ल्या लाडक्या ढिंडा को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।
भिक्ल्या ढिंडा ने मात्र 10 वर्ष की उम्र से ही बांस और लौकी से बने पारंपरिक वाद्य यंत्र ‘तारपा’ को बजाना शुरू किया था। उन्होंने इस सम्मान को ईश्वर का आशीर्वाद बताया और कहा कि यह उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
📌 आदिवासी समुदाय में उत्सव का माहौल
- पद्म पुरस्कारों की सूची में उनका नाम आते ही पालघर भर में, विशेषकर आदिवासी समुदायों में, खुशी और उत्सव का वातावरण छा गया।
- ढिंडा के परिवार की यह 400 साल पुरानी विरासत अब राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हुई है।
- यह गौरव न केवल एक व्यक्ति की उपलब्धि है, बल्कि महाराष्ट्र की समृद्ध आदिवासी कला और संस्कृति की पहचान भी है।
📌 सांस्कृतिक महत्व
- ‘तारपा’ वाद्य यंत्र आदिवासी परंपरा का अभिन्न हिस्सा है।
- ढिंडा ने इसे जीवित रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।
- उनका योगदान आदिवासी कला को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने वाला साबित हुआ है।