पश्चिम बंगाल के हुगली जिले की रहने वाली जोत्सना थंकरा आज पराली से आकर्षक और पर्यावरण अनुकूल कलाकृतियां तैयार कर नई मिसाल पेश कर रही हैं। धान की कटाई के बाद खेतों में बची पराली, जिसे सामान्यतः जला दिया जाता है या बेकार समझा जाता है, वही अब उनके लिए रोजगार और सामाजिक पहचान का मजबूत आधार बन चुकी है।
जोत्सना थंकरा ने पराली को कचरे के बजाय संसाधन के रूप में देखा और उससे सजावटी वस्तुएं, घरेलू उपयोग की सामग्री तथा हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करने का काम शुरू किया। उनका यह प्रयास न केवल पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान कर रहा है।
बताया जाता है कि इस तरह की पहल शुरू करने वाली वह पश्चिम बंगाल की पहली महिला हैं। उनके साथ वर्तमान में 15 से अधिक महिलाएं जुड़कर कार्य कर रही हैं। खास बात यह है कि जो महिलाएं पारिवारिक कारणों से घर से बाहर काम नहीं कर पातीं, उन्हें जोत्सना स्वयं घर-घर जाकर काम उपलब्ध कराती हैं। इससे गृहिणियों को घर बैठे आय अर्जित करने का अवसर मिल रहा है।
इस पहल के माध्यम से कई परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है। महिलाओं को न केवल आय का साधन मिला है, बल्कि आत्मविश्वास और सामाजिक सम्मान भी बढ़ा है। स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए उत्पादों की मांग बढ़ने से ग्रामीण हस्तशिल्प को नई पहचान मिल रही है।
पराली से तैयार की गई इन कलाकृतियों ने यह भी साबित किया है कि यदि कृषि अपशिष्ट का सही उपयोग किया जाए तो वह पर्यावरण के लिए बोझ नहीं, बल्कि अवसर बन सकता है। जोत्सना थंकरा की यह पहल ग्रामीण महिला सशक्तिकरण और Sustainable Livelihood का सफल उदाहरण बनकर उभर रही है।WomenEmpowerment
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