गुजरात हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: पत्नी को थप्पड़ मारना हर बार ‘क्रूरता’ नहीं

गुजरात हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में वैवाहिक विवादों से जुड़े मामलों में ‘क्रूरता’ की परिभाषा को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने दिलीपभाई मंगलाभाई वरली बनाम गुजरात राज्य मामले में सुनवाई करते हुए पति की सजा को पलट दिया।

इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस गीता गोपी ने कहा कि यदि पति अपनी पत्नी को बिना बताए मायके में रात भर रुकने पर थप्पड़ मारता है, तो इसे हर स्थिति में ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी एक घटना के आधार पर कठोर दंडात्मक निष्कर्ष निकालना न्यायसंगत नहीं है, जब तक कि उसमें गंभीर उत्पीड़न या लगातार प्रताड़ना के प्रमाण न हों।

क्या था पूरा मामला?
यह मामला वर्ष 2003 का है, जब वलसाड की एक सेशन कोर्ट ने आरोपी पति को दोषी करार दिया था। ट्रायल कोर्ट ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) के तहत एक वर्ष की सजा और धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाने) के तहत सात वर्ष की कैद की सजा सुनाई थी।

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि पति द्वारा पत्नी के साथ किया गया व्यवहार मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न की श्रेणी में आता है, जिसके चलते महिला ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया। हालांकि, हाई कोर्ट ने मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों की पुनर्समीक्षा करते हुए पाया कि आरोपित के खिलाफ ‘क्रूरता’ और ‘उकसावे’ के पर्याप्त ठोस प्रमाण मौजूद नहीं हैं।

कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि वैवाहिक जीवन में होने वाले छोटे-मोटे विवादों को सीधे आपराधिक ‘क्रूरता’ की श्रेणी में रखना उचित नहीं है। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए आरोपों का ठोस और स्पष्ट प्रमाण होना आवश्यक है।

इस फैसले को वैवाहिक विवादों और धारा 498A के दुरुपयोग से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर के तौर पर देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई में न्यायालयों को संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की दिशा दिखाएगा।


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Khushi Kumari
Author: Khushi Kumari

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