अगर आपने कभी अपने दादा-दादी या नाना-नानी के पुराने घर देखे होंगे, तो आपने जरूर गौर किया होगा कि उनकी छतें आज के आधुनिक मकानों की तरह सीमेंट और कंक्रीट से नहीं बनी होती थीं। पुराने समय के घरों में अक्सर लाल-भूरे रंग की खपरैल वाली छतें देखने को मिलती थीं, जो गांवों और पारंपरिक घरों की पहचान हुआ करती थीं।
आज पक्की छतों और आधुनिक निर्माण तकनीकों के दौर में खपरैल की छतें काफी कम दिखाई देती हैं, लेकिन पुराने समय में इन्हें बनाने के पीछे कई व्यावहारिक कारण थे।
मिट्टी से तैयार होती थीं खपरैल की छतें
खपरैल दरअसल मिट्टी से बनाए गए विशेष आकार के टुकड़े होते हैं। इन्हें मिट्टी को आकार देकर और पकाकर तैयार किया जाता था। इसके बाद इन्हें बांस या लकड़ी के मजबूत ढांचे पर इस तरह लगाया जाता था कि घर को एक सुरक्षित छत मिल सके।
मौसम के हिसाब से उपयोगी थीं खपरैल की छतें
पुराने समय में खपरैल की छतें केवल मजबूरी के कारण नहीं बनाई जाती थीं, बल्कि इनके पीछे स्थानीय मौसम और निर्माण तकनीक का भी ध्यान रखा जाता था। मिट्टी से बनी ये छतें गर्मियों में घर को ठंडा रखने और बारिश के दौरान पानी से बचाव में मदद करती थीं।
ग्रामीण इलाकों में उपलब्ध स्थानीय सामग्री से आसानी से तैयार होने वाली खपरैल की छतें कम लागत में लंबे समय तक उपयोगी साबित होती थीं। यही वजह थी कि वर्षों तक भारतीय गांवों और पारंपरिक घरों में इनका व्यापक इस्तेमाल होता रहा।
हालांकि अब सीमेंट, कंक्रीट और आधुनिक निर्माण सामग्री के बढ़ते इस्तेमाल के कारण खपरैल की छतें धीरे-धीरे गायब होती जा रही हैं, लेकिन आज भी ये पुराने वास्तु ज्ञान और स्थानीय निर्माण परंपरा की एक खास पहचान मानी जाती हैं।#KhaprailRoof #OldHouses #IndianTradition #VillageLife #TraditionalArchitecture #Heritage #History #HindiNews



