बिहार का झिझिया नृत्य: नवरात्र में क्यों करती हैं सिर्फ महिलाएं? जानिए इसकी अनोखी परंपरा और इतिहास

बिहार की समृद्ध लोकसंस्कृति की चर्चा जब भी होती है, झिझिया नृत्य का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। मिथिला क्षेत्र से प्रसिद्ध यह पारंपरिक लोकनृत्य विशेष रूप से शारदीय नवरात्र के दौरान प्रस्तुत किया जाता है। यह केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक विश्वास का जीवंत प्रतीक माना जाता है।

झिझिया नृत्य की सबसे खास बात यह है कि इसमें केवल महिलाएं ही भाग लेती हैं। इसके पीछे सदियों पुरानी लोक मान्यताएं और धार्मिक परंपराएं जुड़ी हुई हैं। मान्यता है कि यह नृत्य समाज और परिवार को नकारात्मक शक्तियों, टोने-टोटके और बुरी नजर से बचाने के उद्देश्य से शुरू हुआ था। इसी वजह से इसे लोक आस्था से जुड़ा विशेष अनुष्ठान भी माना जाता है।

‘झिझिया’ शब्द मैथिली भाषा के ‘झिझ’ से बना है, जिसका अर्थ रोशनी या दीपक होता है। इस नृत्य के दौरान महिलाएं अपने सिर पर मिट्टी का एक विशेष मटका रखती हैं, जिसमें जलता हुआ दीपक होता है। मटके में बने छोटे-छोटे छिद्रों से दीपक की रोशनी बाहर निकलती है, जो इस नृत्य को आकर्षक और आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान करती है। इसी विशेषता के कारण इस लोकनृत्य का नाम ‘झिझिया’ पड़ा।

नवरात्र के दौरान महिलाएं समूह में पारंपरिक गीत गाते हुए गांव और मोहल्लों में झिझिया नृत्य प्रस्तुत करती हैं। लोकगीतों और नृत्य के माध्यम से देवी शक्ति की आराधना की जाती है तथा परिवार और समाज की सुख-समृद्धि, सुरक्षा और कल्याण की कामना की जाती है।

समय के साथ झिझिया नृत्य बिहार की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। आज यह केवल मिथिला तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य के विभिन्न हिस्सों और सांस्कृतिक आयोजनों में भी प्रस्तुत किया जाता है। लोक कलाकार इस परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।

झिझिया नृत्य भारतीय लोक परंपराओं की उस सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जिसमें आस्था, संगीत, नृत्य और सामाजिक एकता का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। यही कारण है कि यह लोकनृत्य आज भी बिहार की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में अपनी विशेष पहचान बनाए हुए है।#Jhijhiya #BiharCulture #Mithila #Navratri #FolkDance #IndianCulture #BiharNews #CulturalHeritage #HindiNews #LatestNews

Leave a Comment

शहर चुनें