CJI सूर्यकांत ने जेंडर हैंडबुक पर जताई आपत्ति

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2023 में प्रकाशित ‘Handbook on Combating Gender Stereotypes’ को लेकर गंभीर आपत्तियां व्यक्त कीं। यह हैंडबुक पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की पहल पर जारी की गई थी। इसका उद्देश्य न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं को लैंगिक पूर्वाग्रहों से जुड़े अनुचित शब्दों और अभिव्यक्तियों के प्रति संवेदनशील बनाना था।

हालांकि, मौजूदा सीजेआई ने इसे व्यवहारिक उपयोगिता के दृष्टिकोण से प्रभावी नहीं माना। न्यायालय की टिप्पणी के अनुसार, दस्तावेज अत्यधिक तकनीकी भाषा में तैयार किया गया है और इसकी प्रस्तुति अकादमिक शैली से प्रभावित प्रतीत होती है। अदालत का मत था कि इस प्रकार की जटिल शब्दावली और फोरेंसिक व्याख्याएं आम नागरिकों, विशेषकर यौन उत्पीड़न से पीड़ित महिलाओं या उनके परिजनों के लिए समझना कठिन हो सकता है।

बेंच की टिप्पणी क्या रही?

सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एन.वी. अंजारिया भी शामिल थे, ने इलाहाबाद हाई कोर्ट की कथित असंवेदनशील टिप्पणियों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लिया।

पीठ ने कहा कि हैंडबुक में sexual assault के विभिन्न पहलुओं को जिस प्रकार से परिभाषित किया गया है, वह अत्यधिक फोरेंसिक और अकादमिक शैली में है। अदालत के अनुसार, ऐसे शब्द और अवधारणाएं न तो रेप सर्वाइवर के लिए सहज हैं और न ही आम जनमानस के लिए सरल। न्यायालय ने संकेत दिया कि संवेदनशील विषयों पर मार्गदर्शन दस्तावेज तैयार करते समय भाषा की सरलता और व्यवहारिक उपयोगिता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

2023 में क्यों जारी हुई थी हैंडबुक?

यह हैंडबुक न्यायिक तंत्र में लैंगिक संवेदनशीलता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तैयार की गई थी। इसमें उन शब्दों और अभिव्यक्तियों की सूची दी गई थी, जिन्हें अदालतों में प्रयोग करने से बचने की सलाह दी गई थी। साथ ही वैकल्पिक, अधिक सम्मानजनक शब्दावली का सुझाव भी शामिल था।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायिक भाषा में सुधार की पहल महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह दस्तावेज न्यायिक अधिकारियों और आम नागरिकों—दोनों के लिए कितनी सहज और उपयोगी है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस हैंडबुक को औपचारिक रूप से निरस्त करने संबंधी कोई लिखित आदेश जारी नहीं हुआ है, लेकिन मौखिक टिप्पणियों ने इसके भविष्य को लेकर प्रश्नचिह्न अवश्य खड़ा कर दिया है।#SupremeCourt #CJI #GenderJustice #JudicialReforms #LegalNews #IndiaLaw

Khushi Kumari
Author: Khushi Kumari

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