खाड़ी देशों में तनाव से शाहजहांपुर की जरी जरदोजी पर संकट, ऑर्डर में भारी गिरावट

 पश्चिम एशिया में बढ़ रहे तनाव के कारण सिर्फ ईंधन की दिक्कत ही नहीं हुई बल्कि इसका असर उद्योग व व्यापार पर भी पड़ रह रहा है। जरी जरदोजी भी इससे अछूता नहीं है। खाड़ी देशों में भले ही यहां से सीधा निर्यात न हो, लेकिन मुंबई, दिल्ली व जयपुर के जिन निर्यातकों के माध्यम से लहंगा, सूट आदि तैयार करके भेजे जाते हैं, उन्होंने अब अार्डर में कटौती करना शुरू कर दी है।

काम में 35 से 40 प्रतिशत तक की कमी आई है, जिस कारण इससे जुड़े व्यापारी व कारीगर सीधे प्रभावित हो रहे हैं। अलीजई में जरी अड्डा पर काम कर रहे परवेज बताते हैं कि काम उतना नहीं मिल रहा, जितनी आवश्यकता है। पिछले 10 दिनों से इसमें ज्यादा कमी आई है। त्योहार का समय है, रुपयों की आवश्यकता है।ठेकेदार मदद भी करेंगे, लेकिन उसके बाद क्या होगा पता नहीं, अगर यह स्थिति ज्यादा लंबी खिंची तो दिक्कत आ सकती है। 15 साल से जरी का काम ही कर रहे हैं। व्यापार करने के लिए पूंजी नहीं है। मजदूरी के सिवाय कोई अन्य रास्ता नहीं रहेगा।सिर्फ परवेज ही नहीं उनकी तरह जिले के हजारों कारीगरों के सामने यही स्थिति आ गई है। इनसे नियमित काम कराने वाले ठेकेदार चाहकर भी दिहाड़ी में कटौती नहीं कर पा रहे, लेकिन उनके पास भी काम सीमित है, जो कपड़े तैयार किए हैं अभी उनका पूरा भुगतान ही नहीं मिल पा रहा है।

ओडीओपी के बाद सुधरी थी स्थिति

ओडीओपी में शामिल किए जाने के बाद जिले में जरी के काम में सुधार हुआ।दो हजार से अधिक कारीगर प्रशिक्षित हुए। इनमें से कई ने अपने अड्डे लगाए और इनके माध्यम से लोगों को काम दिया। यहां से तैयार होने वाली साड़ी, सूट व लहंगे बड़े शहरों में निर्यातकों के जरिए खाड़ी देशाें में भेजे जाते हैं।

कारीगरों का पारिश्रमिक उनके काम से तय होता है। इनको लहंगा, दुपट्टा व साड़ी के कपड़े पर सुई, कटदाना, सितारा से कढ़ाई की जाती है। कटदाना को चिपकाने का भी चलन है। करीगरों को प्रति पीस व वजन के अनुरूप पारिश्रमिक दिया जाता है। कपड़े पर कढ़ाई के बाद इसे कई गुणा अधिक कीमत में बेचा जाता है।

Khushi Kumari
Author: Khushi Kumari

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