पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मोरनी हिल्स क्षेत्र में लंबे समय से लंबित सीमांकन और सर्वे कार्य को लेकर हरियाणा सरकार पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि अगर निर्धारित समयसीमा के भीतर काम शुरू नहीं किया गया तो अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है। हाई कोर्ट ने 18 अप्रैल तक हर हाल में प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं।
मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायाधीश सुमित गोयल की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि 30 जून 2025 को पारित अंतिम आदेश के बावजूद आठ से नौ महीने बीत जाने के बाद भी जमीन पर कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। इस पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि इतनी लंबी अवधि बीतने के बाद भी कार्य शुरू न होना गंभीर चिंता का विषय है।खंडपीठ ने राज्य सरकार से पूछा कि आखिर सर्वे और सीमांकन जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए आवश्यक तैयारियां क्यों नहीं की गईं। अदालत ने विशेष रूप से यह जानना चाहा कि नियुक्त किए गए पटवारियों को इस कार्य के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण दिया गया है या नहीं। इसके साथ ही यह भी पूछा गया कि क्या सर्वे के लिए जरूरी उपकरण और तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं।अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आदेश पारित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे प्रभावी रूप से लागू करना भी राज्य की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने कहा कि यदि प्रशासनिक स्तर पर ढिलाई बरती गई तो संबंधित अधिकारियों को इसके परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
मामले में यह भी सामने आया कि मोरनी हिल्स क्षेत्र में भूमि अधिकारों के निर्धारण और सीमांकन का कार्य लंबे समय से विवादित और लंबित है, जिससे स्थानीय निवासियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कोर्ट ने इस पहलू को भी गंभीरता से लेते हुए कहा कि लोगों के अधिकारों का निर्धारण समय पर होना बेहद जरूरी है।
सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से पेश कुछ प्रशासनिक और तकनीकी अड़चनों का हवाला दिया, लेकिन अदालत इन कारणों से संतुष्ट नहीं दिखी। कोर्ट ने दो टूक कहा कि इस तरह के बहाने अब स्वीकार्य नहीं हैं और तय समय में काम शुरू करना ही होगा। हाई कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 18 अप्रैल की समय सीमा तय करते हुए स्पष्ट किया कि यदि तब तक सर्वे और सीमांकन की प्रक्रिया शुरू नहीं होती है, तो इसे आदेशों की अवहेलना माना जाएगा और अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सकती है।