ग्रामीण हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों के संगम बने सरस आजीविका मेला में इस बार बिहार के मखाने विशेष आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। पूरी तरह पारंपरिक विधि से तैयार किए गए इन मखानों की प्रस्तुति ‘लखपति दीदी’ गीता स्वयं कर रही हैं, जिससे स्टॉल पर लोगों की खास भीड़ देखी जा रही है।
गीता ने बताया कि मखाने की खेती तालाब में बीज डालने से शुरू होती है। लगभग छह माह बाद फसल तैयार होती है, जिसे पानी से निकालकर बीजों को टोकरी में इकट्ठा किया जाता है। इसके बाद उन्हें अच्छी तरह धोकर धूप में सुखाया जाता है।
अंतिम चरण में सूखे बीजों को रेत में गर्म कर पारंपरिक तरीके से लकड़ी से पीटकर फुलाया जाता है, जिससे मखाने तैयार होते हैं। यह प्रक्रिया पूरी तरह देसी और हस्तनिर्मित है, जो उत्पाद की शुद्धता और गुणवत्ता सुनिश्चित करती है।
पारंपरिक निर्माण विधि और प्राकृतिक शुद्धता के कारण इन मखानों की मांग लगातार बढ़ रही है। मेले में आने वाले लोग इन्हें न केवल स्वाद के लिए, बल्कि स्वास्थ्य लाभ को ध्यान में रखते हुए भी खरीद रहे हैं।
ग्रामीण आजीविका को सशक्त बनाने के उद्देश्य से आयोजित यह मेला स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का महत्वपूर्ण मंच साबित हो रहा है।SarasAajeevikaMela
BiharMakhana
LakhpatiDidi
RuralLivelihood
TraditionalFood
HealthySnacks
VocalForLocal
GraminVikas