बात जब महिलाओं की आती है, तो समाज के सारे मापदंड. पूर्वाग्रह और नैतिकता दोहरे मापदंड अपना लेती है। उनकी व्यथा सुने बिना ही एक मत होकर उनकी संवेदनाओं, इच्छाओं, भावनाओं और असल चरित्र को दबा दिया जाता है और अपना निर्णय थोप दिया जाता है।
दैनिक जागरण के नाट्य उत्सव में रविवार को सूरसदन के मंच पर जब खामोश! अदालत जारी है का मंचन किया गया, तो कलाकारों ने भावनात्मक और विचारोत्तेजक अभिनय कर सभी को स्तब्ध कर दिया।
लीला बेनारे के किरदार में गरिमा मिश्रा ने अदालत के एकतरफा निर्णय पर प्रश्न उठाते हुए महिला की वेदना तो व्यक्त की ही साथ ही नैतिक पाखंड को भी कठघरे में खड़ा किया। कलाकारों की सशक्त प्रस्तुति ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा और सभागार तालियों से गूंजता रहा।दैनिक जागरण द्वारा रंगलोक सांस्कृतिक संस्थान के सहयोग से आयोजित द्वितीय दो दिवसीय नाट्य उत्सव की शुरुआत विजय तेंदुलकर कृत प्रसिद्ध नाटक खामोश! अदालत जारी है के प्रभावशाली मंचन से हुई। 100 मिनट के इस नाटक ने समाज में महिलाओं को लेकर मौजूद सोच, पूर्वाग्रह और नैतिकता के दोहरे मापदंडों को बेबाकी से सामने रखा।नाटक के माध्यम से दिखाया गया कि समाज किस प्रकार एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर महिला को उसकी निजी पसंद, विचारों और अतीत के आधार पर कठघरे में खड़ा कर देता है। मंच पर जब अदालत की काल्पनिक कार्यवाई शुरू हुई, तो धीरे-धीरे हंसी-मजाक से हुई शुरुआत एक महिला के जीवन की परतें खोलने लगती है।
उसके साथ समाज के व्यवहार का कटु यथार्थ सामने आता है। मुख्य पात्र लीला बेनारे के जीवन की कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ी, वैसे-वैसे समाज की तथाकथित सभ्यता के पीछे छिपी स्त्री-विरोधी मानसिकता, यौन कुंठाएं और नैतिक पाखंड उजागर होता गया।
नाटक, नाटक के भीतर नाटक की शैली में आगे बढ़ा। मंच पर एक काल्पनिक अदालत की कर्रवाई के माध्यम से मानव जीवन की विडंबनाओं और समाज की मानसिकता को बेहद प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया। मंचन के दौरान कई दृश्य ऐसे रहे जब सभागार में सन्नाटा छा गया और दर्शक गहरी भावनात्मक अनुभूति में डूबे नजर आए।
नाटक के अंत में दर्शकों ने खड़े होकर तालियों से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। नाट्य महोत्सव के पहले ही दिन इस प्रस्तुति ने यह साबित कर दिया कि रंगमंच आज भी समाज के ज्वलंत सवालों को उठाने और लोगों को सोचने के लिए प्रेरित करने का सशक्त माध्यम है।