देश की महत्वपूर्ण जल परियोजनाओं में शामिल चिनाब-ब्यास लिंक प्रोजेक्ट को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। हिमाचल प्रदेश के कोकसर में प्रस्तावित इस परियोजना का मास्टर प्लान तैयार कर लिया गया है। परियोजना के तहत बनने वाला बांध 6048 घन मीटर प्रति सेकंड तक के अत्यधिक जल प्रवाह को भी सुरक्षित रूप से झेलने में सक्षम होगा।
विशेष बात यह है कि उत्तराखंड के चमोली में हुई आपदा जैसी घटनाओं से सबक लेते हुए इस परियोजना में सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के विशेष प्रावधान शामिल किए गए हैं। संभावित प्राकृतिक खतरों, विशेषकर ग्लेशियल झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ को ध्यान में रखते हुए परियोजना के डिजाइन को तैयार किया गया है।
ग्लेशियल झील फटने के खतरे का दोबारा आकलन
केंद्रीय जल आयोग ने अपनी संशोधित रिपोर्ट में परियोजना क्षेत्र में ग्लेशियल झील फटने से उत्पन्न होने वाली बाढ़ यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के जोखिम का पुनर्मूल्यांकन किया है।
रिपोर्ट के अनुसार, यदि बैराज स्थल से लगभग 81 किलोमीटर ऊपर स्थित किसी ग्लेशियल झील के फटने की स्थिति भी उत्पन्न होती है, तब भी यह परियोजना सुरक्षित बनी रहेगी। अनुमान के मुताबिक झील टूटने के बाद बाढ़ का पानी लगभग दो घंटे 50 मिनट में बांध स्थल तक पहुंचेगा और इस दौरान तैयार की गई संरचना उस जल प्रवाह का सामना करने में सक्षम होगी।
चंद्रा नदी का पानी ब्यास में मोड़ा जाएगा
चिनाब-ब्यास लिंक प्रोजेक्ट के तहत चिनाब नदी की सहायक नदी चंद्रा के पानी को ब्यास नदी की ओर मोड़ा जाएगा। इस परियोजना का उद्देश्य जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करना और आवश्यकता के समय पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
गर्मी के मौसम में जब जल संकट की स्थिति उत्पन्न होती है, तब इस अतिरिक्त जल को भाखड़ा बांध के माध्यम से पड़ोसी राज्यों तक पहुंचाया जाएगा। इससे सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन जैसे क्षेत्रों को लाभ मिलने की संभावना है।
चंद्राभागा बेसिन में 100 से अधिक ग्लेशियल झीलें चिन्हित
केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार चंद्राभागा बेसिन क्षेत्र में 100 से अधिक ग्लेशियल झीलों और हिमनदीय संरचनाओं की पहचान की गई है। यही कारण है कि परियोजना के डिजाइन में जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक खतरों को विशेष रूप से शामिल किया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ग्लेशियरों के पिघलने और मौसम में बदलाव के कारण इस तरह की घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है, इसलिए किसी भी बड़े जल ढांचे के निर्माण में सुरक्षा मानकों को सर्वोच्च प्राथमिकता देना आवश्यक है।
गाद निकासी के लिए तैयार किया गया विशेष स्लिपवे सिस्टम
हिमालयी नदियों में गाद और मिट्टी का बहाव एक बड़ी चुनौती माना जाता है। इसे ध्यान में रखते हुए चंद्रा नदी की गाद को साफ करने के लिए परियोजना में नदी के तल पर विशेष स्लिपवे प्रणाली विकसित की गई है।
इस डिजाइन की मदद से मानसून के दौरान जमा होने वाली मिट्टी और गाद स्वतः बहकर आगे निकल जाएगी, जिससे बांध की क्षमता और कार्यक्षमता लंबे समय तक बनी रहेगी। इससे रखरखाव की लागत में कमी आने के साथ-साथ जल प्रवाह भी बाधित नहीं होगा।
रणनीतिक और जल प्रबंधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण परियोजना
विशेषज्ञों के अनुसार चिनाब-ब्यास लिंक प्रोजेक्ट केवल एक जल परियोजना नहीं, बल्कि उत्तर भारत के जल प्रबंधन और संसाधन संतुलन के लिहाज से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके जरिए अतिरिक्त जल संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जा सकेगा और भविष्य में जल संकट से निपटने में मदद मिलेगी।
परियोजना के मास्टर प्लान के तैयार होने के बाद अब इसके अगले चरणों को लेकर भी गतिविधियां तेज होने की संभावना है।#ChenabBeasLinkProject #HimachalPradesh #KoksarDam #GLOF #WaterProject #BhakraDam #CentralWaterCommission #Infrastructure #IndiaNews #HydroProject