बरसात के मौसम में गीली मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू हर किसी को अपनी ओर आकर्षित करती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस प्राकृतिक सुगंध को इत्र की शीशी में भी कैद किया जा सकता है? उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक शहर कन्नौज सदियों से यही अनोखा काम करता आ रहा है। ‘इत्रों की नगरी’ के नाम से मशहूर कन्नौज आज भी बिना किसी केमिकल और अल्कोहल के प्राकृतिक इत्र तैयार करने के लिए दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखता है।
5,000 वर्षों पुरानी है कन्नौज की इत्र परंपरा
कन्नौज को भारत की ‘इत्र राजधानी’ भी कहा जाता है। यहां इत्र निर्माण की परंपरा लगभग 5,000 वर्ष पुरानी मानी जाती है। पीढ़ियों से कारीगर पारंपरिक तकनीकों के जरिए प्राकृतिक फूलों और अन्य सुगंधित तत्वों से इत्र तैयार करते आ रहे हैं। आधुनिक तकनीक के दौर में भी कन्नौज ने अपनी पारंपरिक विरासत और शिल्पकला को जीवित रखा है।
पारंपरिक विधि से तैयार होता है प्राकृतिक इत्र
कन्नौज में गुलाब, बेला, चमेली, गेंदा सहित कई प्रकार के सुगंधित फूलों से हाइड्रो-डिस्टिलेशन (Hydro Distillation) तकनीक के जरिए इत्र बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में तांबे के बड़े-बड़े पात्रों का उपयोग किया जाता है, जिनमें फूलों की प्राकृतिक सुगंध को सावधानीपूर्वक निकाला जाता है। यही वजह है कि यहां तैयार होने वाले इत्र में किसी प्रकार के केमिकल या अल्कोहल का इस्तेमाल नहीं किया जाता।
देश ही नहीं, विदेशों में भी है बड़ी मांग
कन्नौज में तैयार होने वाले प्राकृतिक इत्र की मांग भारत के साथ-साथ खाड़ी देशों और यूरोप तक फैली हुई है। अपनी शुद्धता, लंबे समय तक टिकने वाली सुगंध और पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया के कारण यहां का इत्र अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी विशेष पहचान बना चुका है।
बरसात में गीली मिट्टी की महक से लेकर फूलों की प्राकृतिक खुशबू तक, कन्नौज का इत्र भारतीय पारंपरिक शिल्प, सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक सुगंध का अनूठा संगम माना जाता है।