मौत भी जुदा न कर सकी… कानपुर के दो दोस्तों की एक साथ गई जान, साथ खेले, साथ पढ़े और आखिरी सांस भी ली एक साथ

दोस्ती के कई किस्से सुने और पढ़े जाते हैं, लेकिन लखनऊ के अलीगंज अग्निकांड में जान गंवाने वाले शहर के संयम विज और सूरज सिंह की कहानी हर किसी की आंखें नम कर रही है। दोनों बचपन से एक-दूसरे के साथी थे। साथ खेलते हुए बड़े हुए, एक ही स्कूल में पढ़ाई की, एक ही क्षेत्र में करियर बनाया और आखिरकार मौत भी दोनों को एक साथ ही अपने आगोश में ले गई।

मंगलवार को जब दोनों के शव शहर पहुंचे तो उनके घर पर मातम छा गया। आसपास के लोगों की आंखों में आंसू थे। गोविंदनगर ए-ब्लाक निवासी 29 वर्षीय संयम विज का शव मंगलवार सुबह करीब 4:25 बजे घर पहुंचा, जबकि बर्रा सात निवासी 29 वर्षीय सूरज सिंह का शव सुबह 6:45 बजे घर आया। शव पहुंचते ही दोनों परिवारों में कोहराम मच गया। रिश्तेदारों और परिचित समेत घर पर मौजूद हर शख्स उनकी दोस्तों की यादों को साझा कर भावुक हो गए।अगर पता होता तो न जाने देती…कहकर रो पड़ी मां

सूरज सिंह का शव घर पहुंचा तो मां मीरा सिंह बेसुध होकर गिर पड़ीं। वह बेटे के अंतिम दर्शन के लिए बार-बार कफन हटाने का प्रयास करती रहीं, लेकिन शव की हालत ऐसी नहीं थी कि चेहरा दिखाया जा सके। परिवार वालो ने उन्हें संभाला, लेकिन उनका दर्द थमने का नाम नहीं ले रहा था। रोते-बिलखते हुए वह बार-बार कह रही थीं, रविवार को ही तो गया था, कह रहा था जल्दी लौट आऊंगा। अगर, पता होता कि यह आखिरी बार जा रहा है तो उसे कभी घर से नहीं जाने देती। मां का दर्द देखकर वहां मौजूद लोग भी अपने आंसू नहीं रोक सके।स्कूल से नौकरी तक हर सफर साथ किया तय

गोविंदनगर में रहने के दौरान ही दोनों की दोस्ती बचपन से शुरू हुई थी। सूरज के मामा जितेंद्र सिंह ने बताया कि सूरज और संयम ने दून इंटरनेशनल स्कूल से इंटरमीडिएट की पढ़ाई साथ की थी। इसके बाद दोनों ने काकादेव से एनीमेशन कोर्स किया। पढ़ाई पूरी होने के बाद भी दोनों अलग नहीं हुए।

पांच साल से कर रहे थे एक साथ नौकरी

करीब पांच साल पहले दोनों की एक ही दिन लखनऊ स्थित हेड हापर मल्टीनेशनल एनीमेशन कंपनी में नौकरी शुरू की। नौकरी मिलने की खुशी दोनों परिवारों ने मिलकर मनाई थी। इसके बाद दोनों लखनऊ में रहकर अपने सपनों को साकार करने में लगे थे। दोनों परिवारों का कहना है कि जहां भी सूरज और संयम का नाम लिया जाता था। वहां दूसरा नाम अपने आप जुड़ जाता था। शायद इसलिए मौत भी दोनों को अलग नहीं कर सकी।

छोटे भाई की पढ़ाई और बहन के भविष्य का सहारा था सूरज

सूरज सिंह परिवार का सबसे बड़ा बेटा था और पिता की मौत के बाद उसने घर की पूरी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली थी। वह नौकरी करके छोटे भाई सम्राट की एमबीए की पढ़ाई का खर्च उठा रहा था। सम्राट किदवई नगर स्थित डा.वीरेंद्र स्वरूप मैनेजमेंट कालेज से एमबीए कर रहा है। घटना के समय वह दोस्तों के साथ ऋषिकेश गया हुआ था। भाई की मौत की खबर मिलते ही वह दिल्ली पहुंचा और वहां से फ्लाइट से शहर के लिए रवाना हुआ। परिवार वालों ने बताया कि सूरज अपनी छोटी बहन सौम्या की पढ़ाई का खर्च भी उठा रहा था और उसके भविष्य को लेकर हमेशा चिंता करता था। उसकी मौत ने परिवार के सपनों और खुशियों को उजाड़ कर रख दिया।

सूरज की शादी के सपने भी रह गए अधूरे

परिवार के लोग सूरज की शादी की तैयारियों में जुटे थे। मां मीरा और अन्य रिश्तेदार उसके लिए लड़की देख रहे थे। मामा जितेंद्र सिंह ने बताया कि परिवार की इच्छा थी कि एक साल के अंदी सूरज का विवाह कर दिया जाए। पिता की मौत के बाद उसने जिस तरह घर संभाला था। उससे सभी को उम्मीद थी कि जल्द ही घर में खुशियां आएंगी, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। शादी की तैयारियां शुरू होने से पहले ही घर में मातम छा गया।

पिता को भी आग ने छीना था, अब बेटा भी चला गया

सूरज के परिवार का आग से दुखद रिश्ता पहले से जुड़ा है। मामा जितेंद्र सिंह ने बताया कि सूरज के पिता शिवराम सिंह मलिक पेट्रोल पंप में मैनेजर थे। आठ मार्च 2023 को होली के दिन दादानगर इंडस्ट्रियल एरिया स्थित पेट्रोल पंप के केबिन में शार्ट सर्किट से आग लग गई थी। उस हादसे में सूरज के पिता शिवराम सिंह गंभीर रूप से झुलस गए थे। उन्हें लखनऊ के केजीएमयू में भर्ती कराया गया, जहां उपचार के दौरान उनकी मौत हो गई थी। पिता की मौत के बाद सूरज ने ही परिवार को संभाला, लेकिन अब उसे बेटे को भी आग ने छीन लिया।

लखनऊ जाते समय मामा की कार डंपर से टकराई

सोमवार शाम लखनऊ प्रशासन से सूरज की मौत की सूचना मिलने के बाद परिवार के लोग तत्काल वहां के लिए रवाना हो गए। मामा जितेंद्र सिंह ने बताया कि उनके भाई कृष्ण बिहारी और नरेंद्र भी अपनी कार से लखनऊ जा रहे थे। कार उनका ड्राइवर गुड्डू चला रहा था। उन्नाव के सोहरामऊ थाना क्षेत्र के पास उनकी कार आगे चल रहे डंपर से टकरा गई। हालांकि गनीमत रही कि इस हादसे में किसी को गंभीर चोट नहीं आई। इसके बाद सभी लोग दूसरे वाहन से लखनऊ पहुंचे और आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कीं।

दादी के सत्रहवें पर उठी संयम की अर्थी

गोविंदनगर निवासी संयम विज के घर का दर्द भी कम नहीं था। उनकी दादी ऊषा रानी का 17 दिन पहले निधन हुआ था। मंगलवार को उनका सत्रहवां संस्कार आयोजित होना था। परिवार के लोग संयम के आने का इंतजार कर रहे थे, लेकिन उससे पहले उसकी मौत की खबर पहुंच गई। जिस घर में दादी की आत्मा की शांति के लिए कार्यक्रम होना था, वहां पोते की अर्थी उठी। यह दृश्य देखकर स्वजन के साथ-साथ पड़ोसी भी भावुक हो गए। संयम का बड़ा भाई शुभम गुरुग्राम से कार्यक्रम में शामिल होने आया था, लेकिन उसे भाई की अंतिम यात्रा में शामिल होना पड़ा। संयम की मां सोनी और ननिहाल पक्ष के लोगों का रो-रोकर बुरा हाल था। संयम का अंतिम संस्कार बर्रा दो स्थित स्वर्गाश्रम में किया गया, जिसे मुखाग्नि शुभम ने दी।

जनप्रतिनिधियों ने बंधाया ढांढस

दोनों युवकों की मौत की सूचना मिलते ही राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र के लोग उनके घर पहुंचे। विधायक सुरेंद्र मैथानी, पूर्व विधायक बाल चंद्र मिश्र और क्षेत्रीय पार्षद नीरज गुप्ता ने सूरज के घर पहुंचकर परिवार से मिलकर संवेदना व्यक्त की। हर कोई यही कह रहा था कि संयम और सूरज की दोस्ती आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बन गई है। दोनों ने जीवन का हर पड़ाव साथ तय किया और अंत में मौत ने भी उन्हें अलग नहीं किया।

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